हरिद्वार उत्तराखंड

एम्स ऋषिकेश में मनाया गया ‘हेड-नेक कैंसर जागरूकता माह’विशेषज्ञ चिकित्सकों ने युवाओं में कैंसर के बढ़ते मामलों पर जताई चिंता,,,।

ऋषिकेश/उत्तराखंड*** अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, ऋषिकेश एवं कैंसर चिकित्सा एवं रुधिर विज्ञान विभाग के संयुक्त तत्वावधान में अप्रैल माह के अंतर्गत ‘हेड-नेक कैंसर जागरूकता माह’ मनाया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य आमजन, विशेषकर युवाओं को इस गंभीर बीमारी के प्रति जागरूक करना और समय पर जांच के महत्व को रेखांकित करना रहा।
संस्थान की निदेशक एवं सीईओ प्रोफेसर डॉ. मीनू सिंह ने अपने संदेश में कहा कि हेड-नेक कैंसर केवल एक चिकित्सकीय समस्या नहीं है, बल्कि हमारी जीवनशैली का परिणाम है। यदि समय रहते जागरूकता और सावधानी बरती जाए, तो इस गंभीर बीमारी से बचाव संभव है। निदेशक एम्स प्रो. मीनू सिंह ने बताया कि जागरूकता, संयम और समय पर जांच आदि उपाय ही इस कैंसर के खिलाफ सबसे प्रभावी हथियार हैं।
इस अवसर पर कैंसर चिकित्सा एवं रुधिर विज्ञान विभाग के सह आचार्य एवं कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ. अमित सहरावत ने कहा कि सिर और गर्दन का कैंसर आज भारत में तेजी से एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। पहले यह बीमारी मुख्यतः 50 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में देखी जाती थी, लेकिन अब युवाओं में इसके मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है, जो कि चिंता का विषय है।
उन्होंने बताया कि उपलब्ध अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार, इंटरनेशनल एजेंसी फ़ॉर रिसर्च ऑन कैंसर (ग्लोबोकेन- 2022) की रिपोर्ट में उल्लिखित है कि भारत में कुल 14.6 लाख से अधिक नए कैंसर मामले सामने आए हैं, जबकि कैंसर ग्रसित 9.1 लाख से अधिक लोगों की मृत्यु हुई।
इन मामलों में लिप एवं ओरल कैविटी कैंसर के 1.43 लाख से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं, जो पुरुषों में सबसे आम तथा कुल मिलाकर दूसरा सबसे अधिक पाया जाने वाला कैंसर है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, मुँह, गले एवं स्वरयंत्र से जुड़े सभी कैंसरों को मिलाकर हेड-नेक कैंसर भारत में कुल कैंसर भार का लगभग 30 प्रतिशत है, जो इसे देश का सबसे बड़ा कैंसर समूह बनाता है।
विभाग के कैंसर रोग विशेषज्ञ एवं सह आचार्य डॉ. दीपक सुंदरियाल ने कहा कि इस तरह के कैंसर के बढ़ते मामलों के पीछे तंबाकू और शराब का सेवन इसके प्रमुख कारक हैं, जिनका संयुक्त प्रभाव कैंसर के खतरे को कई गुना बढ़ा देता है। इसके अलावा चुभने वाला दांत, मुँह की साफ सफाई की समस्या, वायु प्रदूषण, रसायनयुक्त भोजन, तनाव और अनियमित दिनचर्या भी इस बीमारी को बढ़ावा दे रहे हैं। लिहाजा चिकित्सा विशेषज्ञ ने विशेष रूप से युवाओं को इन आदतों से दूर रहने का सुझाव दिया है।
विशेषज्ञों के अनुसार हेड-नेक कैंसर मुख्यतः मुँह, गले, स्वरयंत्र, नाक, साइनस और लार ग्रंथियों में विकसित होता है और लगभग 85-90 प्रतिशत स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा के रूप में पाया जाता है। यह बीमारी न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती है, बल्कि व्यक्ति की बोलने, खाने और सामाजिक जीवन की क्षमता पर भी गहरा असर डालती है।
कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि इस बीमारी के शुरुआती लक्षण अक्सर सामान्य प्रतीत होते हैं, जिनमें मुँह में न भरने वाला छाला, आवाज बैठना, गले में खराश, निगलने में कठिनाई, गर्दन में गांठ या सूजन शामिल हैं। यदि यह लक्षण दो सप्ताह से अधिक समय तक बने रहें, तो शीघ्र चिकित्सकीय जांच करानी चाहिए।
बताया गया कि बीमारी के निदान के लिए वर्तमान में बायोप्सी, सीटी स्कैन, एमआरआई और पेट स्कैन जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। साथ ही उपचार के रूप में सर्जरी, रेडिएशन थेरेपी और कीमोथेरेपी, इम्यूनोथेरेपी का उपयोग किया जाता है। विशेषज्ञों ने बताया कि यदि कैंसर का पता शुरुआती अवस्था में चल जाए, तो मरीज पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं।
कैंसर विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि उपचार के बाद भी यदि मरीज तंबाकू और शराब जैसी आदतें नहीं छोड़ता, तो कैंसर दोबारा होने की संभावना बनी रहती है। लिहाजा इस बीमारी से बचाव के लिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाना अत्यंत आवश्यक है।
इस दौरान विशेषज्ञों ने हेड-नेक कैंसर से बचाव के उपायों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि तंबाकू और शराब से दूरी, संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, मौखिक स्वच्छता जैसे उपाय इस बीमारी के जोखिम को काफी हद तक कम कर सकते हैं। साथ ही समाज और सरकार को भी नशामुक्ति अभियान, स्वास्थ्य शिक्षा और नियमित स्क्रीनिंग को बढ़ावा देना चाहिए। इसके लिए व्यक्तिगत, संस्थागत और सामाजिक प्रयास करने होंगे।
इस अवसर पर कार्यक्रम संयोजक अंकित तिवारी, डॉ. हर्ष, डॉ. महेश, डॉ. सुनिकेश, डॉ. परिधि, डॉ. शीतल, दीपिका नेगी, अनुराग पाल, दानीराम, विनीता , आरती ,हिमानी , अरविंद आदि मौजूद रहे।

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